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[Related Acts, Rules and Notifications]
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परिशिष्ट 4 अधीन गवर्नर जनरल की पूर्व मंजूरी प्राप्त की जा चुकी है; अतः एतदुद्वारा निम्नलिखित अधिनियम बनाया जाता है : स्व फ छा के. 9. 10. 11. संयुक्त प्रान्त लघु सिंचाई निर्माण-कार्य अधिनियम, 1920' [The U. P. Minor Irrigation Works Act, 1920] (संयुक्त प्रान्त अधिनियम संख्या 1 सन् 1920) 2 [ उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 12 सन् 19362 द्वारा प्रवृत्ति प्रतिबन्धित ] गवर्नमन्ट आफ इण्डिया ( एडेप्टेशन आफ इण्डियन लाज़) आर्डद 1937 द्वारा अनुकूलित तथा परिष्कृत एवं एडेप्टेशन आफ लाज़ आर्डद 1950 द्वारा अनुकूलित तथा परिष्कृत प्रस्तावना--यह इष्टकर है कि नार्द्न इण्डिया कैनाल ऐण्ड ड्रेनेज ऐक्ट, 1873 के उपबन्धों द्वारा अपेक्षित पैमाने से अपेक्षाकृत छोटे पैमाने पर सिंचाई के निर्माण-कार्यों के निर्माण, सुधार तथा अनुरक्षण की सरकार द्वारा व्यवस्था की जाए; और गवर्नमेन्ट आफ इण्डिया ऐक्ट, 1915 की धारा 79 की उपधारा (2) के विषय-सूची भाग प्रारम्भिक संक्षिप्त नाम और विस्तार परिभाषाएँ भाग 2 योजना का तैयार किया जाना राज्य सरकार का प्रारम्भिक आदेश प्रारम्भिक आदेश का प्रकाशन स्वामियों की विवक्षित सहमति कलेक्टर द्वारा जाँच और रिपोर्ट योजना का प्रारूप तैयार किए जाने का निदेश देने के सम्बन्ध में राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना योजना का प्रारूप तैयार करने वाले अधिकारी की शक्तियाँ धारा 8 के अधीन प्रवेश के फलस्वरूप हुई क्षति के लिए प्रतिकर योजना का प्रारूप. योजना के प्रारूप का प्रकाशन 12. 13. 4. 15. 16. 17. 18. 19. 20. 21. अनुमोदित योजना का राज्य सरकार द्वारा अपनाया जाना अधिसूचित योजना का 1873 के ऐक्ट 8 की धारा 5 के अधीन अधिसूचना के रूप में प्रवर्तन अनुमोदित योजना का परिष्कार या उसके स्थान पर नयी योजना का प्रतिस्थापन भाग 3 निर्माण और अनुरक्षण प्रभारी अधिकारी की नियुक्ति प्रभारी अधिकारी की शक्तियाँ प्रभारी अधिकारी के आदेश के विरुद्ध अपील भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 भाग 4 व्यय की बसूली राज्य सरकार द्वारा प्रतिपूर्ति की वैकल्पिक रीतियाँ उप-शुल्कों के विरुद्ध अपील अपील का परिसीमा काल उद्देश्यों और कारणों के विवरण के लिए गजट, 1920, भाग 7, पृष्ठ 73 देखिए लेफ्टीनेन्ट गर्वनर ने 30 अप्रैल, 1920 तथा गर्वनर जनरल ने 1 जून, 1920 को स्वीकृति प्रदान की तथा गवर्नमेन्ट आफ इण्डिया ऐक्ट की धारा 81 के अधीन गजट, 1920, भाग 7, पृष्ठ 695 में दिनांक 3 जुलाई, 1920 को प्रकाशित हुआ इस अधिनियम के प्रावधान राजकीय नलकूपों के लिए नहीं लागू होते (उ० प्र० अधिनियम संख्या 12 सन् 1936 देखिए ) (393)
394 22. 23. 24, 25 26. 27. 28. 29. 30. 31. 32. 33. 'एश्गिशन मैनुअल आफ आर्ड्स (आई० एम० ओ०) [धारा 1 साधारण न्यायालय की अधिकारिता का 34, अपर्वतन 35, कई अध्यासियों द्वारा भूमि धृत्त होने की दशा में उस पर लगाया गया उप-शुल्क किसके द्वारा देय होगा ' 36. लगान में वृद्धि और कमी 37. लगान में वृद्धि या कमी किए जाने के सम्बन्ध में प्रक्रिया 38. धारा 19 के खण्ड (ख) के अधीन देय धनराशियों का प्रभाजन 39. इस अधिनियम के पूर्व निष्पादित करारों का 40, प्रवर्तन प्रमाणित देयों तथा ऋणों का भूमि-मालगुजारी 41, के रूप में बसूलीय होना बकायों की वसूली के लिए संविदा करने की 42. शक्ति ' 43, देयों की वसूली के लिए लम्बरदारों से अपेक्षा a4, किया जा सकना जुर्मानों के सम्बन्ध में व्यावृत्ति भाग 5 शास्तियाँ और निवारक कार्रवाई 45, अपराध 46. व्यावृत्ति 47. भाग 1 प्रारम्भिक सरसरी तौर पर गिरफ्तारी इस भाग में '' निर्माण कार्य '' की परिभाषा भाग 6 अधिकारिता और प्रक्रिया अधिकार अभिलेख का तैयार किया जाना गैर-सरकारी व्यक्तियों के बीच विवादों का निपटारा जल के उपयोजन या उपयोग से हुई हानि के लिए प्रतिकर जलामार्गों के सम्बन्ध में प्रतिकर धारा 16 (1) (घ) के अधीन प्रवेश करने के कारण हुई क्षति के लिए प्रतिकर अन्य मामलों में होने वाली क्षति के लिए प्रतिकर क्षति के लिए प्रतिकर के दावों की परिसीमा अधिकारियों के विरुद्ध वादों का वर्जन साक्षियों को समन करने तथा उनकी परीक्षा लेने को शक्ति भाग 7 विविध निर्माण-कार्यों का निहित होना राज्य सरकार द्वारा शक्तियों का प्रत्यायोजन राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति 1. संक्षिप्त नाम और विस्तार--(1) यह अधिनियम संयुक्त प्रान्त लघु सिंचाई निर्माण-कार्य अधिनियम, 1920 कहलाएगा। (2) ! [इसका विस्तार सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में होगा ।] एडेप्टेशन आफ लाज आर्डर, 1950 द्वारा प्रतिस्थापित इस अधिनियम का विस्तार निम्न सारणी के स्तम्भ 1 में उल्लिखित क्षेत्रों में, स्तम्भ 2 में उल्लिखित अधिनियम या आर्डर के अधीन किया गया है और इसे ऐसे क्षेत्रों में, स्तम्भ 3 में उल्लिखित विज्ञप्ति, यदि कोई हो के अधीन उस दिनांक से जो प्रत्येक ऐसे क्षेत्र के सामने स्तम्भ 4 में उल्लिखित हैं, प्रवृत्त किया गया है : क्षेत्र अधिनियम अधवा आर्डर जिनके विज्ञाप्ठि यदि कोई है; जिनके; तिथि जिससे प्रवृत्त अधीन विस्तार किया गया अधीन प्रवृत्त किया गया किया गया 1. 2 3 ' 4 1. जिला रामपुर रामपुर (एप्लीकेशन आफ न 30 दिसम्बर, 1949 लाज) ऐक्ट, 1950 2. जिला बनारस बनारस ( एप्लीकेशन आफ संख्याएं 3262 (1) तथा 30 नवम्बर, 1949 लाज) आर्डर, 1949 3. जिला टेहरी गढ़वाल रेहरी गढ़वाल (एप्लीकेशन आफ लाज) आर्डर, 1949 3262 (2)/17, दिनांक 30 नवम्बर, 1949 G क्दैव
धारा 6] संयुक्त प्रान्त लघु सिंचाई निर्माण कार्य अधिनियम, 1920 395 2. परिभाषाएँ--जब तक विषय या प्रसंग में कोई बात प्रतिकूल न हो, इस अधिनियम में-- (1) “निर्माण “के अन्तर्गत (उसके वैयाकरणिक रूप-भेदों तथा सजातीय पदों सहित) परिसीमित समय के भीतर तथा विनिर्दिष्ट रीति से किया गया सुधार भी है; (2). “लघु सिंचाई निर्माण कार्य “” या “'निर्माणि-कार्य '” का तात्पर्य किसी ऐसे सिंचाई, आप्लावन, जल-निकास या रक्षात्मक निर्माण-कार्य या ऐसे निर्माण-कार्य की प्रणाली से, चाहे वह प्राकृतिक हो या कृत्रिम, जिसके राज्य सरकार द्वारा निर्माण या अनुरक्षण के सम्बन्ध में उस सरकार को यह प्रतीत हो कि उसके सम्बन्ध में नार्द्न इण्डिया कैनाल ऐशण्ड ड्रेनेज ऐक्ट द्वारा अवेक्षित पैमाने से अपेक्षाकृत छोटे पैमाने पर कार्य करने की आवश्यकता है; (3) ‘@Ml के अन्तर्गत मातहतदार, दवामी काश्तकार, पट्टेदार दवामी, शरहमुअय्ययन काश्तकार, तथा बंधककर्ता या कब्जा रखने वाला बन्धकदार भी है; किन्तु वह बंधककर्त्ता या बन्धकदार जिसका कब्जा न हो या कुछ वर्षों की अवधि का पट्रेदार नहीं है, और जहाँ स्वामित्व का उच्चतर तथा निम्नतर अधिकार साथ-साथ हो, वहाँ उच्चतर अधिकार का स्वामी भी नहीं है। भाग 2 योजना का तैयार किया जाना 3. राज्य सरकार का प्रारम्भिक आदेश--राज्य सरकार कलेक्टर या किसी अन्य व्यक्ति को इस बात की जांच करने के लिए निदेश दे सकेगी कि किसी विनिर्दिष्ट स्थानीय क्षेत्र में किसी प्रकार के लघु सिंचाई निर्माण-कार्य का निर्माण या अनुरक्षण कार्य प्रारम्भ किया जाना वांछनीय है या नहीं । 4. प्रारम्भिक आदेश का प्रकाशन--(1) तदुपरान्त कलेक्टर सम्बन्धित ग्राम या ग्रामों में उस स्थान को, जहाँ और वह दिनांक (जो नोटिस के प्रकाशन के दिनांक के बाद के बयालीस दिनों से पूर्व का न होगा) जिसकी जाँच की जाएगी, विनिर्दिष्ट करते हुए एक नोटिस प्रकाशित करेगा, और धारा 47 के अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन रहते हुए, नोटिस की एक प्रति भी किसी ऐसे स्वामी पर तामील कराएगा जिसकी भूमि के सम्बन्ध में उसे यह विश्वास हो कि प्रस्थापित निर्माण-कार्य के निर्माण या अनुरक्षण से उसके. प्रभावित होने की संभावना है । (2) नोटिस में प्रस्तावित्त निर्माण या अनुरक्षण का सामान्य स्वरूप उपवर्णित होगा और उसमें ऐसे समस्त हिंतबद्ध व्यक्तियों से, जिन पर उससे प्रभाव पड़ने की संभावना हो, कोई ऐसी आपत्ति या सुझाव जो वे प्रस्तुत करना चाहें, नोटिस में विहित दिनांक को या 'उससे पूर्व प्रस्तुत करने, और जाँच करने के लिए नियत दिनांक को ऐसी आपत्ति या सुझाव के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने को कहा जाएगा। 5. स्वामियों की विवक्षित सहमति--भूमि का ऐसा प्रत्येक स्वामी, जिसकी भूमि के ऐसे निर्माण या अनुरक्षण से प्रभावित होने की संभावना हो और जो नोटिस द्वारा अनुज्ञात अवधि के भीतर, विहित रीति से कोई आपत्ति या सुझाव प्रस्तुत नहीं करता, उसके सम्बन्ध में इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि उसने अपनी सहमति दे दी है। 6. कलेक्टर द्वारा जाँच और रिपोर्ट--(1) यदि कलेक्टर या जाँच करने के लिए नियुक्त अन्य व्यक्ति, यथाविधि प्रस्तुत की गयी किसी आपत्ति या सुझाव पर विचार करने तथा ऐसा साक्ष्य लेने के पश्चात्, जो वह आवश्यक समझे, यह पाए कि निर्माण-कार्य के निर्माण या अनुरक्षण से प्रभावित होने के लिए सम्भाव्य भूमि के कम से कम आधे स्वामी ऐसे निर्माण या अनुरक्षण के लिए सहमत हैं या सहमत हुए समझे जाते हैं तो वह रिपोर्ट में, जो राज्य सरकार को प्रस्तुत की जाएगी, अपनी कार्यवाही का विवरण समाविष्ट करेगा और ऐसी रिपोर्ट में उस रीति के सम्बन्ध में भी प्रस्थापनाएँ करेगा जिसके अनुसार राज्य सरकार की
396 एरिगेशन मैनुअल आफ आार्ड्स (आई० एम० ओ०) [धारा 7 उसके द्वारा किए गए पूंजीगत या आवर्ती व्यय के लिए क्षतिपूर्ति की जानी है या जिसकी प्रतिपूर्ति उसे स्वयं करनी है। (2) यदि ऐसी भूमि के, जो ऐसे निर्माण या अनुरक्षण से प्रभावित हो या जिसके ऐसे प्रभावित होने की संभावना हो, आधे से अधिक स्वामी निर्माण-कार्य के निर्माण या अनुरक्षण के विरुद्ध हों तो केवल इसी आशय की रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत की जाएगी । 7. योजना का प्रारूप तैयार किए जाने का निदेश देने के सम्बन्ध में राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना --पूर्ववर्ती धारा की उपधारा (1) में निर्दिष्ट रिपोर्ट के प्राप्त होने पर राज्य सरकार ऐसी और जाँच के पश्चात्, यदि कोई हो, जो वह आवश्यक समझे, सरकारी गजट में निर्माण या अनुरक्षण, या दोनों की योजना का प्रारूप तैयार करने का निदेश देने वाली अधिसूचना प्रकाशित कर सकेगी । 8. योजना का प्रारूप तैयार करने वाले अधिकारी की शक्तियाँ--ऐसे प्रकाशन पर ऐसा कोई अधिकारी जिसे राज्य सरकार सामान्य या विशेष आदेश द्वारा तदर्थ सशक्त करे, धारा 3 में विनिर्दिष्ट क्षेत्र के भीतर किसी भी भूमि पर या उससे लगी हुई भूमि पर किसी ऐसे कार्य को करने के प्रयोजनार्थ, जो उसकी राय में योजना का प्रारूप तैयार करने के लिए आवश्यक हो, प्रवेश कर सकेगा या किसी अन्य व्यक्ति को प्रवेश करने के लिए प्रतिनियुक्त कर सकेगा, परन्तु किसी भवन या किसी आवास गृह से संलग्न प्रांगण या बगीचे में प्रवेश करने से पूर्व समुचित सूचना दी जाएगी । 9. धारा 8 के अधीन प्रवेश के फलस्वरूप हुई क्षति के लिए प्रतिकर--धारा 8 के अधीन प्रवेश की दशा में, उबत धारा के अधीन सशक्त अधिकारी ऐसे प्रवेश के समय ऐसी किसी भी क्षति के लिए प्रतिकर निविदत्त करेगा जो उक्त धारा के अधीन की गई किसी कार्यवाही के फलस्वरूप हुईं हो और इस प्रकार निविदत्त किसी धनराशि की पर्याप्तता के सम्बन्ध में विवाद होने की दशा में वह उसे विनिश्चय के लिए कलेक्टर के पास तुरन्त निर्दिष्ट करेगा और ऐसा विनिश्चय अंतिम होगा। 10, योजना का प्रारूप--(1) धारा 8 के अधीन राज्य सरकार द्वारा सशक्त अधिकारी राज्य सरकार को योजना का प्रारूप प्रस्तुत करेगा और ऐसी योजना में, जहाँ तक वह आवश्यक समझें, निम्नलिखित विशिष्टियों का समावेश किया जाएगा तथा उसके साथ निम्नलिखित दस्तावेजें भेजी जाएंगी अर्थात् : (%) निर्माण या अनुरक्षण के लिए प्रस्तावित निर्माण-कार्य की विशिष्टियाँ तथा नक्शा और उसके कारण अन्तर्वलित पूंजीगत या आवर्ती व्यय का प्राक्कलन; (@) वह अनुमानित समय जो निर्माण की योजना के पूरी होने के लिए अपेक्षित्त हो; (ग). विवरण जिसमें निम्नलिखित के ब्यौरे हों- '.. () वह भूमि और भूमि में हित जिन्हें उसकी राय में, योजना को कार्यान्वित करने के लिए अर्जित करना आवश्यक होगा, हो) ऐसी भूमि का अंश और उसमें हित जो बातचीत द्वारा अर्जित किए जा सकते हैं, (छा) ऐसी भूमि का अंश और उसमें हित जिन्हें भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) के अधीन अर्जित करना आवश्यक होगा, और (iv) अर्जन के प्रयोजन के लिए अपेक्षित प्रत्येक व्यय के सम्बन्ध में प्राक्कलन, (घ). वह सीमा जहाँ तक उसकी राय में योजना को कार्यान्वित करने से सम्पत्ति को पहुँचने बाली क्षति के लिए प्रतिकर देना आवश्यक होगा और इस प्रयोजन के लिए अपेक्षित व्यय; (%) योजना से लाभान्वित होने वाला क्षेत्र; (=) निर्माण-कार्य के प्रबन्ध की रीति;
धारा 12] संयुवत प्रान्त लघु सिंचाई निर्माण कार्य अधिनियम, 1920 397 (छ) धारा 19 के प्रति निर्देश से वह रीति या रीतियाँ जिससे या जिनसे राज्य सरकार द्वारा किए गए व्यय के लिए उसकी प्रतिपूर्ति या क्षतिपूर्ति की जाएगी; (%) जहाँ कि लाभान्वित क्षेत्र के समस्त, या उनमें से कोई स्वामी सहमत हों कि-- () वे राज्य सरकार द्वारा योजना के निष्पादन के सम्बन्ध में समय-समय पर किए गए किसी व्यय या उस पर विनिर्दिष्ट दर से ब्याज के लिए या दोनों के लिए राज्य सरकार के प्रति स्वयं उत्तरदायी होंगे; या ः (i) वे राज्य सरकार द्वारा योजना के निष्पादन के लिए राज्य सरकार को किसी निश्चित संविदा धनराशि या धनराशियों का (उनके बकायों पर विनिर्दिष्ट दर से ब्याज सहित) भुगतान करेंगे; ः वहाँ ऐसे स्वामियों द्वारा इनमें से किसी भी आशय का निष्पादित किया गया करार; (झ) किसी नदी का या प्राकृतिक धारा के रूप में बहने वाले किसी सोते का या किसी झील या गतिहीन जल के अन्य प्राकृतिक संग्रह का विवरण, जिसके जल का उपयोग या प्रयोग निर्माण-कार्य के प्रयोजन के लिए किया जाना थघाहिए; () कोई अन्य विषय जो मामले की परिस्थितियों के अनुसार अपेक्षित हों । (2) ऐसी योजना में ऐसी विशिष्टियाँ भी समाविष्ट होंगी और उसके साथ कोई ऐसी दस्तावेजें होंगी जो धारा 47 के अधीन बनाए गए किसी नियम द्वारा अपेक्षित हों । (3) उपधारा (1) के खण्ड (ज) में निर्दिष्ट किसी करार में यह व्यवस्था की जा सकेगी कि उसमें अभिव्यक्त की गयी धनराशि का भुगतान करने पर निर्माण-कार्य, भाग 3 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, करार निष्पादित करने वाले स्वामियों में निहित होगा और उनके द्वारा अनुरक्षित किया जाएगा । 11. योजना के प्रारूप का प्रकाशन--(1) राज्य सरकार के संतोषानुसार योजना का प्रारूप तैयार हो जाने पर एक नोटिस, जिसमें ऐसी विशिष्टियाँ दी गई हों जो तदर्थ नियम द्वारा अपेक्षित हों, और वह स्थान तथा समय बताया गया हो जहाँ और जब योजना निरीक्षण के लिए उपलब्ध रहेगी, ऐसा प्रत्येक ग्राम के किसी प्रमुख स्थान में नोटिस की एक प्रति चिपकाकर, जिसकी भूमि पर कलेक्टर की राय में योजना के कार्यान्बित किए जाने के फलस्वरूप प्रभाव पड़ने को संभावना हो, प्रकाशित किया जाएगा । (2) कलेक्टर इसी आशय का नोटिस किसी ऐसी भूमि के, जिस पर योजना से प्रभाव पड़ने की संभावना हो, स्वामी या अध्यासी पर या ऐसे स्वामी या अध्यासी के अभिकर्त्ता पर भी तामील करा सकेगा। (3) उपधारा (1) के अधीन नोटिस प्रकाशित हो जाने पर कोई व्यक्ति, जिस पर योजना से प्रभाव पड़ने की संभावना हो, ऐसे प्रकाशन के दिनांक से एक मास के भीतर कलेक्टर को योजना के सम्बन्ध में अपनी लिखित आपत्ति प्रस्तुत कर सकेगा । (4) कलेक्टर राज्य सरकार को ऐसी समस्त आपत्तियाँ, जो उसे प्रस्तुत की जाएँ, ऐसी किसी अभ्युक्ति के साथ भेजेगा, जो वह ऐसी आपत्तियों के सम्बन्ध में करना चाहे । 12. अनुमोदित योजना का राज्य सरकार द्वारा अपनाया जाना--(1) योजना के प्रारूप में ऐसे परिष्कार के पश्चात् जो पूर्ववर्ती धारा के अधीन की जाने वाली आपत्तियों के कारण अपेक्षित प्रतीत हो, राज्य सरकार यदिं वह योजना के सम्बन्ध में अग्रेतर कार्यवाही करना उचित समझे तो, उसे यथा अनुमोदित रूप में सरकारी गजर में प्रकाशन द्वारा अधिसूचित कर सकेगी और तत्पश्चातू वह ऐसी अनुमोदित योजना को इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार कार्यान्वित करने की हकदार होगी : प्रतिबन्ध यह है कि यदि राज्य सरकार की राय में योजना में सारभूत परिवर्तन किया गया है तो धारा 11 के उपबन्ध संशोधित योजना पर लागू होंगे ।
398 एरिगेशन मैनुअल आफ आर्डर्स (आई० WHo &io) [ धारा 13 (2) यथानुमोदित योजना का उपधारा (1) के अधीन प्रकाशन इस बात.का निश्चयात्मक सबूत होगा कि उसमें अभिलिखित कोई सहमति यथाविधि प्राप्त कर ली गई है, उक्त योजना उसमें तदर्थ विनिर्दि्ट क्षेत्र को (जिसे एतत्पश्चात् लाभान्वित क्षेत्र कहा गया है) लाभान्वित करेगी और उक्त योजना सब प्रकार से यधाबिधि तैयार और अनुमोदित की गयी है । 13. अधिसूचित योजना का 1873 के ऐक्ट 8 की धारा 5 के अधीन अधिसूचना के रूप में प्रवर्तन--धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन अधिसूचितत योजना में, किसी नदी या प्राकृतिक धारा के रूप में बहने वाले किसी सोते के या किसी झील या गतिंहीन जल के अन्य प्राकृतिक संग्रह के जल का योजना से सम्बन्धित निर्माण कार्य के प्रयोजन के लिए उपयोग या प्रयोग करने के आशय की सूचना नार्दर्न इण्डिया कैनाल ऐण्ड ड्रेनेज ऐक्ट, 1873 (1873 का 8) की धारा 5 के अधीन ऐसी अधिसूचना के रूप में प्रवर्तित होगी जिसमें यह घोषणा की गई हो कि अधिसूचना के दिनांक से तीन मास की समाप्ति के पश्चात् उक्त जल का इस प्रकार उपयोग या प्रयोग किया जाएगा। 14. अनुमोदित योजना का. परिष्कार या उसके स्थान पर नयी योजना का प्रतिस्थापन-- (1) राज्य सरकार धारा 12 के अधीन अधिसूचित किसी भी अनुमोदित योजना को समय-समय पर परिष्कृत कर सकेगी या उसके स्थान पर दूसरी योजना प्रतिस्थापित कर सकेगी और धारा 12 के अधीन अधिसूचित योजना पर लागू होने वाले इस अधिनियम के उपबन्ध इस प्रकार परिष्कृत या प्रतिस्थापित किसी योजना पर तत्पश्चातू लागू होंगे : (2) प्रतिबन्ध यह है कि किसी योजना के सम्बन्ध में इस अधिनियम द्वारा अपेक्षित कोई सहमति, ' प्रकाशन या अन्य बात, किसी योजना में परिवर्तन या किसी वर्तमान योजना के स्थान पर नयी योजना के प्रतिस्थापन के सम्बन्ध में भी आवश्यक होगी | भाग 3 निर्माण और अनुरक्षण 15. प्रभारी अधिकारी की नियुक्ति--राज्य सरकार सामान्य या विशेष आदेश द्वारा, एक अधिकारी सियुक्त कर सकेगी (जिसे एतत्पश्चात् प्रभारी अधिकारी कहा गया है) जो ऐसे लघु सिंचाई निर्माण-कार्य के निर्माण या अनुरक्षण का प्रभारी होगा जिसके सम्बन्ध में कोई अनुमोदित योजना प्रकाशित की गयी हो । 16. प्रभारी अधिकारी की शक्तियाँ-- (1) प्रभारी अधिकारी तथा ऐसे किसी अधिकारी की, जिसका वह अधीनस्थ हो, निम्नलिखित शक्तियाँ होंगी, अर्थात् : (क) निर्माण-कार्य के सम्बन्ध में नार्दन इण्डिया कैनाल ऐण्ड ड्रेनेज ऐक्ट, 1873 (1873 का 8) की धारा 6 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करना; (@) किसी व्यक्ति को लिखित आदेश द्वारा कोई ऐसा कार्य करने से रोकना जिससे उसकी राय में निर्माण-कार्य की दक्षता कम होती हो या कम होने की संभावना हो; (M) लाभान्वित क्षेत्र के भीतर भूमि के किसी स्वामी या अध्यासी से, लिखित आदेश द्वारा, उस क्षेत्र के अन्तर्गत किसी ऐसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में, जो उसकी हो या जिस पर उसका कब्जा हो, यह अपेक्षा करना कि वह ऐसी कार्यवाही करे या करने की अनुज्ञा दे जो निर्माण कार्य के परिरक्षण या अनुरक्षण के लिए आवश्यक प्रतीत हो या जो लाभान्वित क्षेत्र के भीतर, रजबहों द्वारा या अन्यथा, निर्माण-कार्य के लाभ को बढ़ाने या उसका विस्तार करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक प्रतीत हो; (घ). निर्माण-कार्य का निर्माण या अनुरक्षण करने या उसके सम्बन्ध में हुई किसी दुर्घटना के प्रभाव का निवारण या उपचार करने या सम्पूर्त किए गए जल के प्रयोग का निरीक्षण या विनियमन करने या उक्त निर्माण द्वारा सिंचित अथवा किसी जल उपशुल्क अथवा अन्य धनराशि से
धारा 19] .. संयुक्त प्रान्त लघु सिंचाई निर्माण कार्य अधिनियम, 1920 399 प्रभार्य भूमियों की माप लेने या निर्माण-कार्य के उचित विनियमन या प्रबन्ध के लिए कोई अन्य आवश्यक कार्य करने के प्रयोजन के लिए किसी भूमि में प्रवेश करना या किसी अन्य व्यक्ति को प्रवेश करने के लिए प्राधिकृत करना; (डे. आपातिक स्थिति में, ऐसी भूमि के स्वामी या अध्यासी से, जो निर्माण-कार्य से लाभ उठा रहा हो, बाजार दर पर ऐसे श्रमिक उपलब्ध कराने में सहायता करने की अपेक्षा करना जो निर्माण-कार्य के परिरक्षण या अनुरक्षण के लिए आवश्यक हो; (F) कोई ऐसा कार्य करना या किए जाने से रोकना जिसके सम्बन्ध में उसके द्वारा खण्ड (ख) और (ग) के अधीन आदेश जारी किया गया हो, प्रतिबन्ध यह है कि जिस व्यक्ति को ऐसा आदेश दिया गया हो वह उस आदेश में विनिर्दिष्ट समय के भीतर उसका पालन करने में असफल रहा हो, और प्रतिबन्ध यह भी है कि खण्ड (ग) के अधीन जारी किए गए किसी आदेश के _ सम्बन्ध में इस खण्ड के अधीन कोई कार्यवाही तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि ऐसा आदेश धारा 17 के अधीन अंतिम न हो गया हो; (छ) प्रभागीय नहर अधिकारी होने की दशा में, किसी जलमार्ग का उपयोग करने वाले व्यक्तियों को, ऐसे जल मार्ग के जल के, किसी ऐसी सार्वजनिक सड़क या नहर या जल निकास की नाली के, जो उक्त जलमार्ग के बनाए जाने से पूर्व प्रयोग में लायी जाती हो, ऊपर से बहाव के लिए उपयुक्त पुलों, पुलियों या अन्य निर्माण-कार्यों के निर्माण के लिए या किसी ऐसे निर्माण-कार्य की मरम्मत के लिए, लिखित आदेश जारी करना और जिस व्यक्ति को ऐसा आदेश जारी किया गया हो उसके समुचित समय के भीतर आदेश का पालन करने में असफल होने पर उस व्यवित के व्यय पर, जो धारा 28 के अधीन वसूल किया जा सकेगा, अपेक्षित कार्यवाही स्वयं करना । (2) उपधारा (1) के खण्ड (ग) द्वारा प्रदत्त शक्ति के अन्तर्गत, एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को किसी जलमार्ग के या किसी जलमार्ग के निर्माण के लिए अपेक्षित किसी भूमि या भूमि में अधिकार के, ऐसे प्रतिकर का भुगतान करने पर, जो धारा 40 में विहित रीति से अवधारित किया जाएगा, अन्तरण का आदेश देने की शक्ति भी होगी । 17. प्रभारी अधिकारी के आदेश के विरुद्ध अपील--(1) धारा 16 के अधीन प्रभारी अधिकारी द्वारा जारी किए गए आदेशों के विरुद्ध पन््द्रह दिन के भीतर ऐसे अधिकारी या अधिकारियों को, जैसाकि राज्य सरकार नियम द्वारा निदेशित करे, लिखित अपील की जा सकेगी किन्तु जब तक उनके विरुद्ध विहित रीति से अपील न की जाए, वे अंतिम होंगे । (2) अपील प्राधिकारी का आदेश अंतिम होगा। , 18. भूमि अर्जन अधिनियम, 1894--(1) कोई भूमि या भूमि में कोई हित, जिसे राज्य सरकार की राय में धारा 12 के अधीन अधिसूचित योजना के अनुसरण में अर्जित करना आवश्यक हो, भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) के प्रयोजनों के लिए सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अपेक्षित समझा जाएगा । (2) उक्त अधिनियम की धारा 23 की उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, उस अधिनियम की धारा. 6 के अधीन ऐसी भूमि से सम्बन्धित घोषणा के प्रकाशन के दिनांक को उसका बाजार मूल्य इस अधिनियम की धारा 3 के अधीन प्रारम्भिक आदेश जारी किए जाने के समय का बाजार मूल्य समझा जाएगा । भाग 4 व्यय की वसूली 19. राज्य सरकार द्वारा प्रतिपूर्ति की वैकल्पिक रीतियाँ--राज्य सरकार किसी ऐसे व्यय के लिए जिसे वह निर्माण या अनुरक्षण की या दोनों की किसी अनुमोदित योजना के सम्पादन में करे या करने के
400 एरिगेशन मैनुअल आफ आर्ड्स (आई० एम० ओ०) [ धारा 20 लिए सहमत हो, निम्नलिखित में से किसी एक या अधिक ढंग से स्वयं क्षतिपूर्ति या प्रतिपूर्ति कर सकेगी, अर्थात् : (F) लाभान्वित क्षेत्र के भीतर भूमि के स्वामियों से ऐसे एकरूप उप-शुल्क या भेदात्मक उप- शुल्कों के उद्ग्रहण द्वारा जो राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार ऐसी भूमि पर अधिरोपित किए गए हों, चाहे ऐसा लाभ प्रत्यक्ष सिंचाई, रिसाव, आप्लावन, कुँओं में जल सम्पूर्ति के सुधार या अत्यधिक जल के मिकास के रूप में हो या अन्यथा; या (@) धारा 10 की उपधारा (1) के खण्ड (ज) (i) या खण्ड (ज) (1) के अधीन करार निष्पादित करने वाले किन्हीं स्वामियों से उस करार के अधीन देय किन्हीं धनराशियों की वसूली करके; या (ग). निर्माण-कार्य के राज्य सरकार द्वारा प्रबन्ध किए जाने के फलस्वरूप होने वाली प्रकीर्ण आय की वसूली करके । ; 20, उप-शुल्कों के विरुद्ध अपील--(1) इस अधिनियम के अधीन किसी उप-शुल्क के निर्धारण या उद्ग्रहण के विरुद्ध अपील उस अधिकारी को की जा सकेगी, जिसे नियम द्वारा तदर्थ सशक्त किया गया हो। (2) प्रत्येक अपील में अपील का खर्च अपील का निर्णय करने वाले अधिकारी के विवेकाधीन होगा। (3) इस धारा के अधीन अपीलकर्ता के विरुद्ध अधिनिर्णीत खर्च अपीलकर्ता से इस प्रकार वसूल किया जा सकेगा मानो बह अपीलकर्ता द्वारा देय भूमि मालगुजारी का बकाया हों । 21. अपील का परिसीमा काल--किसी उप-शुल्क के सम्बन्ध में कोई अपील तब तक नहीं की जा सकेगी जब तक कि वह उप-शुल्क की प्रथम बार माँग किए जाने के समय से तीस दिन के अन्दर प्रस्तुत न की जाए। 22. साधारण न्यायालय की अधिकारिता का अपर्वतन--किसी उप-शुल्क निर्धारण के विरुद्ध और किसी ऐसे व्यक्ति के, जिस पर उप-शुल्क निर्धारित किया जाए या लगाया जाए, दायित्व पर कोई आपत्ति इस अधिनियम में या उसके अधीन व्यवस्थित रीति या अधिकारी के अतिरिक्त किसी अन्य रीति से या किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा न की जा सकेगी : \ प्रतिबन्ध यह है कि इस धारा की कोई बात किसी व्यक्ति को सिविल न्यायालय से यह घोषणा प्राप्त करने से निवारित्त न करेगी कि वह, इस आधार पर कि वह उस भूमि का स्वामी नहीं है जिसके सम्बन्ध में . निर्धारण किया गया है, ऐसे निर्धारण के लिए दायी नहीं है, और निर्धारण अधिकारी ऐसी घोषणा से बाध्य होगा। 23. कई अध्यासियों द्वारा भूमि धृत्त होने की दशा में उस पर लगाया गया उप-शुल्क किसके द्वारा देय होगा--जब उप-शुल्क ऐसी भूमि पर लगाया जाए जो संयुक्त रूप से कई स्वामियों द्वारा धृत हो, तों वह प्रबन्धक या अन्य व्यक्ति द्वारा जो ऐसी भूमि के लगान या लाभ प्राप्त करता हो, देय होगा, जो ऐसे संयुक्त स्वामियों की ओर से इस प्रकार भुगतान की गई किसी धनराशि को उनसे वसूल कर सकेगा । 24. 'लगान में वृद्धि और कमी--(1) किसी अधिनियमित्ति में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, किन्तु इस सम्बन्ध में बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए यह है कि जहाँ इस अधिनियम के अधीन निर्मित या अनुरक्षित लघु सिंचाई निर्माण-कार्य से लाभ प्राप्त हों, वहाँ ऐसे लाभों को, चाहे वे प्रत्यक्ष सिंचाई की व्यवस्था या रिसाव, आप्लावन, कुँओं में जल सम्पूर्ति के सुधार या अत्यधिक जल के निकास के कारण या अन्यथा हों, लगान में वृद्धि किए जाने का आधार समझा जाएगा। (2) इसी प्रकार किसी लघु, सिंचाई निर्माण कार्य से प्राप्त होने वाले किन्हीं लाभों की समाप्ति या उनका बन्द हो जाना लगान में कमी किए जाने का आधार समझ जाएगा।
धारा 30] संयुक्त प्रान्त लघु सिंचाई निर्माण कार्य अधिनियम, 1920 401 25. लगान में वृद्धि या कमी किए जाने के सम्बन्ध में प्रक्रिया--जैसाकि धारा 47 के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा अन्यथा उपबस्धित किया जाए उसके सिवाय किसी स्थानीय क्षेत्र में पूर्ववर्ती धारा के अधीन समस्त दावे ऐसे राजस्व न्यायालय में वाद संस्थित करके किए जाएंगे, जो ऐसे स्थानीय ध्षेत्र में लगान में वृद्धि या कमी की जाने के वादों पर विचार करने के लिए सशक्त हों और न्यायालय ऐसे वाद के निवारण में, उस प्रक्रिया का अनुसरण करेगा, जो ऐसे स्थानीय क्षेत्र में लगान में वृद्धि या कमी की जाने के वादों के विचारण के लिए विहित हो। 26. धारा 19 के खण्ड (ख ) के अधीन देय धनराशियों का प्रभाजन--जब धारा 19 के खण्ड (ख) के अधीन लाभान्वित क्षेत्र के भीतर भूमि के तत्कालीन स्वामियों से कोई धनराशि वबसूलीय हो तो वे उनके संयुक्त: और पृथकत: दायी होंगे । 27. इस अधिनियम के पूर्व निष्पादित कराऐों का प्रवर्तन-- (1) किसी ऐसे लघु सिंचाई निर्माण-कार्य के निर्माण, मरम्मत और अनुरक्षण के सम्बन्ध में जो इस अधिनियम के प्रवृत्त होने की दशा में इसके अधीन निर्मित या अनुरक्षित किया गया होता, इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के दिनांक के पूर्ववर्ती बारह वर्ष की अवधि के भीतर निष्पादित समस्त करार वहाँ तक जहाँ तक कि उनके निबन्धन इस अधिनियम से संगत हों, इस अधिनियम के अधीन निष्पादित करार समझे जाएंगे, और तदनुसार प्रभावी होंगे । (2) उपधारा (1) की कोई बात किसी लघु सिंचाई निर्माण-कार्य के सम्बन्ध में ऐसे किसी करार पर तब तक लागू नहीं होगी, जब तक कि राज्य सरकार सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा यह न घोषित कर दे ' कि निर्माण-कार्य इस धारा * के उपबन्धों के अधीन है। _ 28. प्रमाणित देयों तथा ऋणों का भूमि-मालगुजारी के रूप में बसूलीय होना--कोई धनराशि जो इस अधिनियम के अधीन वैध रूप से देय हो और प्रभारी अधिकारी द्वारा इस प्रकार देय प्रमाणित हो और कोई धनराशि जो इस अधिनियम के अधीन अन्यथा वसूलनोय न हो किन्तु धारा 27 में निर्दिष्ट करार के अधीन देय हो, तथा जो उसके देय होने के दिनांक के पश्चातू अंशदत्त रहे कलेक्टर द्वारा किसी व्यक्ति से, जो उसके दायी हो, इस प्रकार वसूल की जा सकेगी मानो वह भूमि-मालगुजारी का बकाया हो । 29. बकायों की वसूली के लिए संविदा करने की शक्ति--(1) प्रभारी अधिकारों या कलेक्टर किसी व्यक्ति से उसके द्वारा कोई ऐसी धनराशि वसूल किए जाने तथा उसे राज्य सरकार को भुगतान किए जाने के लिए करार निष्पादित कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन किसी तीसरे पश्चषकार द्वारा देय हो। (2) ऐसा करार निष्पादित हो जाने पर उक्त व्यक्ति ऐसी धनराशि वाद द्वारा इस प्रकार वसूल कर सकेगा मानो वह उस भूमि के सम्बन्ध में, जिसकी बाबत ऐसी धनराशि देय हो या जल की सप्पूर्ति की गई हो या उसका उपयोग किया गया हो, उसे देय लगान का बकाया हो । (3) यदि ऐसा व्यक्ति किसी ऐसी धनराशि के भुगतान करने में व्यत्तिक्रम करेगा जो इस धारा के अधीन उसके द्वारा वसूल की जानी हो, तो ऐसी धनराशि कलेक्टर द्वारा धारा 28 के अधीन उससे वसूल की जा सकेगी और यदि ऐसी धनराशि या उसका कोई अंश इसके बाद भी तीसरे पक्षकार द्वारा देय रह जाए तो इस प्रकार देय धनराशि या उसका कोई अंश कलेक्टर द्वारा तीसरे पक्षकार से उसी रीति से वसूल किया जा सकेगा। ; 30. देयों की बसूली के लिए लम्बरदारों से अपेक्षा किया जा सकना--(1) धारा 29 के अधीन किसी अन्य व्यक्ति के साथ करार न होने की दशा में, कलेक्टर महाल के किसी लम्बरदार से किन्हीं ऐसी धनराशियों के वसूल तथा भुगतान करने की अपेक्षा कर सकेगा जो ऐसे महाल में किसी भूमि या जल के सम्बन्ध में किसी तीसरे पक्षकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन देय हों, और इस प्रकार अपेक्षित किसी * इस धारा के अन्तर्गत विज्ञप्तियों के लिए उद्देश्यों एवं कारणों का विवरण देखिए
402 'एरिगेशन मैनुअल आफ आर्ड्स (आई० एम० औओए०) [ धारा 31 धनराशि का भुगतान करने में असफल रहने की दशा में वह उसे भूमि-मालगुजारी के बकाए के रूप में वसूल कर सकेगा। (2) जहाँ कि लम्बरदार उपधारा (1) के अधीन किसी धनराशि का भुगतान करने के लिए अपेक्षित हो वहाँ उसके द्वारा या उसकी ओर से कलेक्टर द्वारा किसी तीसरे पक्षकार से भूमि-मालगुजारी और पारिश्रमिक फीस की वसूली के सम्बन्ध में तत्समय लागू विधि के समस्त उपबन्ध, उसके लिए दायी तीसरे पक्षकार से ऐसी धनराशियों की वसूली पर इस प्रकार लागू होंगे मानो वे इस अधिनियम में अधिनियमितत किए गए हों । 31. जुर्मानों के सम्बन्ध में व्यावृत्ति--धारा 28, 29 तथा 30 की कोई बात जुर्मानों पर लागू न होगी । भाग 5 शास्तियाँ और निवारक कार्रवाई 32. अपराध--जो कोई उचित प्राधिकार के बिना और स्वेच्छा से निम्नलिखित में से कोई कार्य करेगा, अर्थात्-- (1) किसी निर्माण-कार्य को क्षति पहुँचाएगा, उसमें परिवर्तन करेगा, उसे बढ़ाएगा या उसमें बाधा डालेंगा; (2) किसी निर्माण-कार्य में जल की सम्पूर्ति में या उससे, उसके अन्दर से, उसके ऊपर से या नीचे से जल के प्रवाह में हस्तक्षेप, वृद्धि या कमी करेगा; (3) किसी निर्माण-कार्य या उसके भाग के अनुरक्षण के लिए या किसी निर्माण-कार्य अथवा उसके किसी भाग के उपयोग के लिए उत्तरदायी होते हुए, उसके जल का अपव्यय रोकने के लिए उचित पूर्वोपाय करने में उपेक्षा करेगा या उससे जल के प्राधिकृत वितरण में हस्तक्षेप करेगा या ऐसे जल का अप्राधिकृत रीति से उपयोग करेगा; (4). किसी निर्माण-कार्य के जल को इस प्रकार दूषित या गन्दा करेगा कि वह उन प्रयोजनों के लिए कम उपयुक्त रह जाए जिनके लिए उसका साधारणतया उपयोग किया जाता है; (5). किसी लोक सेवक के प्राधिकार से लगाए गए जल स्तर-चिह्न या जलमापी को नष्ट करेगा या हटाएंगा; (6) पशुओं या गाड़ियों को किसी निर्माण-कार्य पर या उसके आर-पार इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के प्रतिकूल निकालेगा या निकलवाएगा; (7). इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी ऐसे नियम का उल्लंघन करेगा जिसका उल्लंघन दण्डनीय घोषित किया गया हो, या कलेक्टर अथवा अन्य अधिकारी के किसी वैध आदेश की अवज्ञा करेगा; वह किसी मैजिस्ट्रेट के समक्ष दोषसिद्ध होने पर कारावास का, जो एक मास से अधिक अवधि का न होगा या जुमनि का, जो पचास रुपए से अधिक का न होगा, या चालू रहने वाले अपरांध की दशा में अतिरिक्त जु्मनि का, जो प्रथम दोषसिद्धि के दिनांक॑ के पश्चात् उस प्रत्येक दिन के लिए जिसको अपराध चालू रहेगा, दस रुपए तक का हो सकेगा, भागी होगा। 33, व्यावृत्ति--इसमें अन्तर्विष्ट कोई बात इस अधिनियम के अधीन दषण्डनीय किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति का किसी अन्य विधि के अधीन अभियोजन निवारित न करेगी, परन्तु कोई व्यक्ति एक ही अपराध के लिए दो बार दण्डित न किया जाएगा। * कृपया नवीनतम शासनादेश दौखिए
धारा 36] संयुक्त प्रान्त लघु सिंचाई निर्माण कार्य अधिनियम, 1920 403 34. सरसरी तौर पर गिरफ्तारी--कोई व्यक्ति, जो किसी निर्माण-कार्य का प्रभारी हो या उसमें सेवायोजिंत हो, उसकी भूमियों या भवनों से किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसे वह निम्नलिखित में से कोई भी अपराध करते देखे, हटा सकेगा या बिना वारण्ट के अभिरक्षा में ले सकेगा और विधि के अनुसार कार्यवाही किए जाने के लिए अधिलम्ब किसी मैजिस्ट्रेर के समक्ष या निकटतम पुलिस थाने को ले जा सकेगा या भेज सकेगा : () जानबूझकर किसी निर्माण-कार्य को क्षति पहुँचाना या उसमें बाधा डालना; (@) उचित प्राधिकार के बिना किसी निर्माण-कार्य में या उससे जल की सम्पूर्ति या जल के प्रवाह में इस प्रकार हस्तक्षेप करना कि ऐसा निर्माण-कार्य खतरे में पड़ जाए, उसे क्षति पहुँचे या उसकी उपयोगिता कम हो जाए। 35. इस भाग में '' निर्माण कार्य '' की परिभाषा--इस भाग में शब्द “' निर्माण-कार्य'' के अन्तर्गत किसी ऐसे लघु सिंचाई निर्माण-कार्य के प्रयोजनार्थ, जिसके सम्बन्ध में कोई अनुमोदित योजना प्रकाशित की गई हो राज्य सरकार द्वारा अध्यासित सभी भूमियाँ तथा ऐसी भूमियों पर राज्य सरकार द्वारा अध्यासित अथवा उसके सभी भवन, मशीनरी, बाड़, फाटक तथा अन्य संरचनाएं, वृक्ष, फसल, पेड़-पौधे अथवा अन्य उत्पाद भी समझे जाएंगे । भाग 6 अधिकारिता और प्रक्रिया 36. अधिकार अभिलेख का तैयार किया जाना--(1) जब कभी राज्य सरकार विशेष आदेश द्वारा, या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा, ऐसा निदेश दे, कलेक्टर किसी ऐसे लघु सिंचाई निर्माण- कार्य के लिए, जिसके सम्बन्ध में कोई अनुमोदित योजना प्रकाशित की गई हो, ऐसा अभिलेख तैयार या पुनरीक्षित करेगा जिसमें निम्नलिखित सभी या उनमें से कोई विषय उपदर्शित्त किए गए हों, अर्थात् : (%) सिंचाई की प्रणाली या नियम; (ख) जल के सम्बन्ध में अधिकार और वे शर्तें जिन पर ऐसे अधिकारों का उपभोग किया जाता है; (ग?). मिलों की संरचना, मरम्मत, पुनर्निर्माण तथा कार्यकरण के सम्बन्ध में अधिकार और वे शर्तें जिन पर ऐसे अधिकारों का उपभोग किया जाता है; और (घ) ऐसे अन्य विषय जो राज्य सरकार नियमों द्वारा तदर्थ विहित करे । (2) इस प्रकार तैयार या पुनरीक्षित किए गए अभिलेख में की गई प्रविष्टियाँ अभिलिखित विषयों के सम्बन्ध में किसी विवाद में साक्ष्य के रूप में सुसंगत होंगी और जब तक कि तत्प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए या उनके स्थान पर वैध रूप से कोई नई प्रविष्टि प्रस्थापित न कर दी जाए उनके लिए यह उपधारणा की जाएगी कि वे सत्य हैं : प्रतिबन्ध यह है कि ऐसी किसी प्रविष्टि का अर्थान्वयन ऐसा नहीं किया जाएगा जिससे कि इस अधिनियम द्वारा राज्य सरकार को प्रदत्त शक्तियों में से किसी का परिसीमन होता हो । (3) जब उपधारा (1) में उल्लिखित सभी विषयों को या उनमें से किन्हीं को उपदर्शित करने वाला अभिलेख भूमि-मालगुजारी के किसी बन्दोबस्त में तैयार किया गया हो तो ऐसा अभिलेख इस धारा के अधीन तैयार किया गया समझा जाएगा । (4) प्रत्येक हितबद्ध व्यक्ति, कलेक्टर को या कलेक्टर के निदेश के अधीन कार्य करने वाले किसी व्यक्ति को इस धारा के अधीन सही रूप से अभिलेख तैयार करने के लिए आवश्यक समस्त सूचना प्रस्तुत करने के लिए बाध्य होगा ।
404 एरिगेशन मैनुअल आफ आर्ड्स (आई० एम० ओ०) [ धारा उ7 (5) यू० पी० ऐक्ट सं० 3 सन् 1907--यूनाइटेड प्राविन्सेज लैण्ड रेवेन्यू ऐक्ट, 1901 के अध्याय 4 के उपबन्ध, यथाशक्य, ऐसे प्रत्येक अभिलेख की तैयारी तथा पुनरीक्षण के सम्बन्ध में लागू होंगे । 37, गैर-सरकारी व्यक्तियों के बीच विवादों का निपटारा--(1) धारा 39 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, जब कभी इस अधिनियम के अधीन किसी ऐसे लघु सिंचाई निर्माण-कार्य के, जिसकी बाबत कोई अनुमोदित योजना प्रकाशित की गई हो, इस अधिनियम के अधीन निर्माण या अनुरक्षण से उत्पन्न होने वाले या ऐसे निर्माण कार्य के सम्बन्ध में जारी किए गए किसी आदेश से उत्पन्न होने वाले किसी अधिकार या दायित्व के सम्बन्ध में दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच विवाद हो जाए तो कोई ऐसा व्यक्ति विवाद का विषय बताते हुए निर्माण-क़ार्य के प्रभारी अधिकारी को लिखित रूप से आवेदन कर सकेगा। (2, तदुपरान्त वह अधिकारी अन्य हितबद्ध व्यक्तियों को नोटिस देगा कि वह उस दिनांक को, जो नोटिस में उपदर्शित किया जाएगा, उक्त सामले में जाँच की कार्यवाही करेगा । (3) पूर्वोक्त अधिकारी जाँच के लिए निश्चित दिनांक को या किसी पश्चातूवर्ती दिनांक को विवादग्रस्त विषय को अवधारण करने वाला आदेश देगा जब तक कि वह उस मामले को कलेक्टर को अंतरित न कर दे (जैसाकि करने के लिए वह एतदद्वारा सशवत है), जो ऐसी दशा में उस मामले में जाँच करेगा और अवधारण करने बाला आदेश देगा। (4) उपधारा (3) के अधीन किसी आदेश द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति की जो कार्यवाही में पक्षकार है, उस क्षति के लिए जो की गई हैं, किसी अन्य ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध प्रतिकर अधिनिर्णीत किया जा सकेगा; और इस प्रकार अधिनिर्णीत कोई प्रतिकर, सम्बद्ध क्षेत्र में अधिकारिता रखने वाले राजस्व न्यायालय से आवेदन करके, ऐसे वसूल किया जा सकेगा मानो वह उस न्यायालय की डिग्री द्वारा अधिनिर्णीत किया गया B (5) जल के उपयोग या वितरण के सम्बन्ध में निर्माण-कार्य के प्रभारी अधिकारी या कलेक्टरों का आदेश, जहाँ तक कि वह उसके दिए जाने के समय बोयी गई या उगती हुई किसी फसल 'पर लागू होता हो, अंतिम होगा, और जहाँ तक कि वह किसी भावी फसल पर लागू होता हो, वह जब तक और जहाँ तक कि इस धारा के अधीन किसी नए विवाद में दिए गए किसी पश्चात्वर्ती आदेश द्वारा या किसी सिविल न्यायालय द्वारा अपनी अधिकारिता के अन्तर्गत किसी वादे या कार्यवाही में पारित किसी डिक्री द्वारा रद्द न कर दिया जाए, प्रवृत्त बना रहेगा । (6) उपधारा (5) के प्रयोजन के लिए किसी विवाद को नया विवाद उस दशा में समझा जाएगा जब वह भिन्न या परिवर्तित परिस्थितियों से उत्पन्न हो । 38. जल के उपयोजन या उपयोग से हुई हानि के लिए प्रतिकर--नार्द्न इंडिया कैनाल ऐण्ड ड्रेनेज ' ऐक्ट, 1873 (1873 का 8)* की धारा 7 से 13 तक के. (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएँ भी हैं) उपबन्ध पूर्वोक्त धाराओं द्वारा प्रकल्पित विवरण की, और इस अधिनियम के अधीन किसी योजना के कार्यान्वयन से हुई, किसी रुकावट, कमी या हानि के लिए प्रतिकर की बाबत ऐसे लागू होंगे मानो वे इस अधिनियम में अधिनियमित किए गए हों । 39. जलमार्गों के सम्बन्ध में प्रतिकर--(1) जहाँ कि किसी जलमार्ग के या किसी जलपार्ग के निर्माण के लिए अपेक्षित किसी भूमि या भूमि में हित के, प्रतिकर के संदाय पर, अन्तरण का निदेश धारा 16 के अधीन किए गए किसी आदेश द्वारा दिया जाता है वहाँ कलेक्टर ऐसे आदेश से प्रभावित किसी व्यवित के आवेदन पर भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) के उपबन्धों के अधीन प्रतिकर अवधारित करने को कार्यवाही करेगा; किन्तु उस दशा में जब प्रतिकर पाने वाला व्यक्ति ऐसी वांछा करे, वह ऐसा प्रतिकर अध्यासित या अन्तरित भूमि या जलमार्ग के सम्बन्ध में देय लगान--प्रभार के रूप में अधिनिर्णीत कर सकेगा। * कृपया इस अधिनियम के लिए इसी पुस्तक की पृष्ठ संख्या 501 देखिए
धारा 461] संयुक्त प्रान्त लघु सिंचाई निर्माण कार्य अधिनियम, 1920 405 . (2) यदि उपधारा (1) के अधीन अधिनिर्णीत किसी धनराशि या लगान-प्रभार का उसे पाने के लिए हकदार व्यक्ति द्वारा वैध रूप से माँगे जाने पर, भुगतान नहीं किया जाता तो उक्त धनराशि कलेक्टर द्वारा इस प्रकार वसूल की जाएगी मानों वह भूमि मालगुजारी का बकाया हो और वसूल हो जाने पर वह उसके द्वारा उस व्यक्ति को दे दी जाएगी जो उसे पाने का हकदार हो । 40. धारा 16 (1) ( घ ) के अधीन प्रवेश करने के कारण हुई क्षति के लिए प्रतिकर--निर्माण कार्य को होने वाली किसी दुर्घटना के प्रभाव को रोकने या उसका उपचार करने के प्रयोजन के लिए लघु सिंचाई निर्माण-कार्य की पार्श्वस्थ किन्हीं भूमियों में धारा 16 (1) के खण्ड (घ) के अधीन किए गए प्रवेश के प्रत्येक मामले में प्रभारी अधिकारी उक्त भूमियों को पहुँची सम्पूर्ण क्षति के सम्बन्ध में उनके मालिकों या अध्यासियों को प्रतिकार निविदत्त करेगा । यदि ऐसा निधिदान स्वीकार न किया जाए तो प्रभारी अधिकारी उस मामले को कलेक्टर को निर्दिष्ट करेगा जो उस क्षेति के लिए प्रतिकर अधिनिर्णीत करने के सम्बन्ध में इस प्रकार कार्यवाही करेगा मानों राज्य सरकार ने भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) की धारा 35 के अधीन भूमियों के अध्यासन का निदेश दिया हो। 41. अन्य मामलों में होने बाली क्षति के लिए प्रतिकर--जहाँ कि किसी लघु सिंचाई निर्माण-कार्य के सम्बन्ध में, इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों में से किन्हीं के प्रयोग के कारण किसी व्यक्ति को धारा 9, 16 (2), 38, 39 (1) या 40 में निर्दिष्ट विवरण को क्षति से भिन्न कोई क्षति पहुँचे तो निर्माण-कार्य का प्रभारी अधिकारी धारा 47 के अधीन तदर्थ बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, उस व्यक्ति को जिसे क्षति पहुँची हो, समुचित प्रतिकर निविदत्त करेगा और प्रतिकर के रूप में निविदत्त धनराशि की पर्याप्तता के सम्बन्ध में विवाद होने की दशा में, वह उस मामले को निर्णय के लिए तुरन्त कलेक्टर को निर्दिष्ट करेगा और ऐसा निर्णय अन्तिम होगा। ' 42. क्षति के लिए प्रतिकर के दावों की परिसीमा--इस अधिनियम के अधीन क्षति के लिए प्रतिकर का कोई दावा क्षति के पहुँचने से एक वर्ष के अवसान के पश्चात् तब के सिवाय नहीं किया जाएगा जब कि दावेदार उक्त अवधि के भीतर अपना दावा न करने का पर्याप्त कारण दर्शित करे । 43. अधिकारियों के विरुद्ध वादों का बर्जन--इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्ण की गयी या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए सरकार के किसी अधिकारी के या सरकार के किसी अधिकारी के निदेशों के अधीन कार्य करने बाले किसी व्यक्ति के विस्द्ध कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी । ः 44. साक्षियों को समन करने तथा उनकी परीक्षा लेने की शक्ति--कोई अधिकारी जो कोई जाँच करने या प्रतिकर निर्धारित करने के लिए इस अधिनियम के अधीन या उसके द्वारा सशक्त हो, साक्षियों को समन करने और उनकी परीक्षा करने से सम्बन्धित ऐसी समस्त शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का अधिनियम संख्या 5) द्वारा सिविल न्यायालयों को प्रदत्त है और ऐसी जाँच या कार्यवाही न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी । भाग 7 Tafaer 45. निर्माण-कार्यों का निहित होना--प्रत्येक निर्माण-कार्य उन व्यक्तियों या प्राधिकारी में निहित समझा जाएगा जिन्हें धारा 12 के अधीन अधिसूचित योजना के निबन्धनों द्वारा, तत्समय उनके निर्माण या अनुरक्षण का कार्य सौंपा गया हो । 46. राज्य सरकार द्वारा शक्तियों का प्रत्यायोजन--राज्य सरकार इस अधिनियम के अधीन की अपनी शक्तियों में से किन्हीं शक्तियों को राजस्व परिषद् या आयुक्त या अन्य अधिकारी को प्रत्यायोजित कर
406 एर्गिशन मैनुअल आफ आर्ड्स (आई० एम० ओ०) [ धारा 47 सकेगी और ऐसी दशा में राज्य सरकार के प्रति निर्देशों का अर्थान्वयन ऐसे किया जाएगा मानो वे, यथास्थिति राजस्व परिषद् आयुक्त या अन्य अधिकारी के प्रति निर्देश हों । 47. राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति--(1) राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए पूर्व प्रकाशन के पश्चात् नियम बना सकेगी । (2) विशिष्टत: और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित समस्त या उनमें से किन्हीं विषयों के सम्बन्ध में बनाए जा सकेंगे, अर्थात्-- (क) इस अधिनियम के अधीन हाथ में लिए जाने बाले निर्माण कार्यों का स्वरूप, उनकी व्याप्ति और विस्तार; (ख) धारा 3 के अधीन किसी जाँच का किया जाना तथा योजना का प्रारूप तैयार किए जाने से सम्बन्धित अन्य विषय; ' (M) धारा 4 तथा 11 के अधीन नोटिसों का प्रकाशन तथा उनका तामील किया जाना; ' (घ). योजना के प्ररूप में समाविष्ट की जाने वाली या उसके साथ प्रस्तुत की जाने वाली विशिष्टियां तथा दस्तावेज; (®) स्वामियों पर उद्ग्रहणीय उप-शुल्क और उनके निर्धारण की रीति तथा भुगतान का समय; (=) वह अधिकारी जिसको धारा 20 के अधीन अपील की जा सकेगी; (छ) लगान में वृद्धि या कमी के लिए धारा 24 के अधीन की जाने वाली कार्यवाहियों में अपनायी जाने वाली प्रक्रिया; (ज). धारा 29 या 30 के अधीन राज्य सरकार के लिए धनराशियाँ वसूल करने वाले व्यक्तियों का पारिश्रमिक, और वसूली में उचित रूप से किए गए व्ययों के लिए उनकी क्षतिपूर्ति; () इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार को प्रदत्त किन्हीं शक्तियों का उसके द्वारा प्रत्यायोजन । (3) इस धारा के अधीन कोई नियम बनाते समय राज्य सरकार यह घोषित कर सकेगी कि ऐसे नियम का उल्लंघन इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय होगा। . (4) इस धारा के अधीन बनाए गए समस्त नियम सरकारी गजट में प्रकाशित किए, जाएंगे और इस प्रकार से प्रकाशित होने पर ऐसे प्रभावी होंगे मानो वे इस अधिनियम के अधीन अधिनियमित किए गए हों ।